शिवप्रताप सिंह. लॉकडाउन के कारण आरोन से करीब 17 किमी दूर जंगल के बीच बसा इस्माइलपुर गांव इस समय वीरान हो गया है। ज्यादातर घरों में ताले लटके हुए हैं या उन्हें किसी न किसी अस्थाई इंतजाम से बंद करके रखा गया है। किसी के दरवाजे के आगे खाट बांधकर रखी गई है। तो कहीं बल्लियों को लगाकर छोड़ दिया गया है। सवाल उठता है कि यह पूरा गांव कहां गायब हो गया? आगे चलने पर सन्नाटे को तोड़ती हुईं कुछ आवाजें सुनाई देती हैं। इस आवाज का पीछा करते हुए गांव के एक बाड़े जैसे हिस्से में पहुंचे तो वहां कुछ बच्चे और बुजुर्ग दिखाई पड़ते हैं। पता चलता है कि इस गांव में फिलहाल यही लोग बचे हैं। बाकी लोग कहां गए ..़ ? यह पूछने पर जवाब मिलता है - राजस्थान। इसी दौरान दो-तीन जवान लोग भी आ जाते हैं। उनसे पता चलता है कि लगभग 190 लोग राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में फंसे हुए हैं। यह लोग मजदूरी करने के लिए गए थे। आमतौर पर वे अप्रैल के दूसरे हफ्ते में वापस लौटने लगते हैं। कारण यह है कि इन दो माह के दौरान यहीं फसल काटने का काम मिल जाता है पर इस बार लॉक डाउन के कारण वे लोग वहीं फंसकर रह गए हैं। 80 साल के बुजुर्ग बच्चों के लिए बनाते हैं खाना पूर्व सरपंच सिब्बा बंजारा बताते हैं कि गांव में करीब 50 परिवार रहते हैं। इनमें से कई तो बच्चों सहित ही चित्तौड़गढ़ चले गए थे। कुछ अपने बच्चों को यहीं छोड़ गए। इन बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी ज्यादातर बुजुर्गों के हाथ में है। हाल यह है कि एक परिवार में तो 80 साल के अमर सिंह बंजारा खाना बनाते हैं। रोजाना 5 लोगों के लिए दो टाइम का खाना बनाना पड़ता है। गांव के राधेलाल बंजारा बताते हैं कि 30 परिवारों के घर पूरी तरह खाली हैं। बाकी के बच्चे व बुजुर्ग दो-तीन घरों में एक साथ मिलकर रहते हैं। देखा जाए तो गांव के 45 से ज्यादा घर ऐसे हैं जिनमें कोई नहीं रह रहा है। अगर यहां कोई रात में आए तो लगेगा कि पूरा का पूरा गांव ही वीरान हो गया है। 2 दिन से बच्चों से माता पिता की बात भी नहीं हुई बंशी बंजारा ने बताया कि लॉकडाउन के बाद से ही राजस्थान में फंसे हमारे लोग यहां आने की कोशिश कर रहे हैं। दो-तीन बार वे 50-60 किमी पैदल चलकर आगे पहुंचे लेकिन इसी दौरान किसी न किसी जगह उन्हें रोक दिया गया। जब दोबारा से लॉक डाउन बढ़ा तो उन्होंने फिर कोशिश की लेकिन इस बार उन्हें चित्तौड़गढ़ से ही बाहर नहीं निकलने दिया गया। अभी दो दिन से तो हम मोबाइल से भी बात नहीं कर पा रहे हैं। गांव के लोगों ने ही किया क्वारेंटाइन आरोन से 7 किमी दूर रुसल्ला गांव के पूजारी को वहीं के लोगों ने 14 दिन के लिए क्वारेंटाइन कर दिया है। दरअसल 14 अप्रैल को इंदौर से आए 9 लोगों को पुजारी ने अपने घर पर खाना खिलाया था। बताया जाता है कि वे उनके रिश्तेदार थे। यह बात गांव में फैल गई। इसके बाद से पुजारी का गांव में प्रवेश निषिद्ध हो गया। उनका घर भी गांव के लगभग बाहर ही है। जिस मंदिर में वे पूजा करते हैं, वह पहले ही बंद है। हाल यह है कि जिस पुजारी को रोजाना 8-10 किलो आटे के अलावा दूध, घी का खूब चढ़ावा मिल जाता था, उन्हें अब गांव में ही घुसने से मना कर दिया गया है। यहां तक की पूजा के लिए मिलने वाले दूध की आपूर्ति भी बंद कर दी गई है। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today 190 people of Ismailpur prepare food to feed the stomach of some children left in the trapped village of Chittaurgarh


शिवप्रताप सिंह. लॉकडाउन के कारण आरोन से करीब 17 किमी दूर जंगल के बीच बसा इस्माइलपुर गांव इस समय वीरान हो गया है। ज्यादातर घरों में ताले लटके हुए हैं या उन्हें किसी न किसी अस्थाई इंतजाम से बंद करके रखा गया है। किसी के दरवाजे के आगे खाट बांधकर रखी गई है। तो कहीं बल्लियों को लगाकर छोड़ दिया गया है। सवाल उठता है कि यह पूरा गांव कहां गायब हो गया? आगे चलने पर सन्नाटे को तोड़ती हुईं कुछ आवाजें सुनाई देती हैं। इस आवाज का पीछा करते हुए गांव के एक बाड़े जैसे हिस्से में पहुंचे तो वहां कुछ बच्चे और बुजुर्ग दिखाई पड़ते हैं।
पता चलता है कि इस गांव में फिलहाल यही लोग बचे हैं। बाकी लोग कहां गए ..़ ? यह पूछने पर जवाब मिलता है - राजस्थान। इसी दौरान दो-तीन जवान लोग भी आ जाते हैं। उनसे पता चलता है कि लगभग 190 लोग राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में फंसे हुए हैं। यह लोग मजदूरी करने के लिए गए थे। आमतौर पर वे अप्रैल के दूसरे हफ्ते में वापस लौटने लगते हैं। कारण यह है कि इन दो माह के दौरान यहीं फसल काटने का काम मिल जाता है पर इस बार लॉक डाउन के कारण वे लोग वहीं फंसकर रह गए हैं।

80 साल के बुजुर्ग बच्चों के लिए बनाते हैं खाना
पूर्व सरपंच सिब्बा बंजारा बताते हैं कि गांव में करीब 50 परिवार रहते हैं। इनमें से कई तो बच्चों सहित ही चित्तौड़गढ़ चले गए थे। कुछ अपने बच्चों को यहीं छोड़ गए। इन बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी ज्यादातर बुजुर्गों के हाथ में है। हाल यह है कि एक परिवार में तो 80 साल के अमर सिंह बंजारा खाना बनाते हैं। रोजाना 5 लोगों के लिए दो टाइम का खाना बनाना पड़ता है। गांव के राधेलाल बंजारा बताते हैं कि 30 परिवारों के घर पूरी तरह खाली हैं। बाकी के बच्चे व बुजुर्ग दो-तीन घरों में एक साथ मिलकर रहते हैं। देखा जाए तो गांव के 45 से ज्यादा घर ऐसे हैं जिनमें कोई नहीं रह रहा है। अगर यहां कोई रात में आए तो लगेगा कि पूरा का पूरा गांव ही वीरान हो गया है।

2 दिन से बच्चों से माता पिता की बात भी नहीं हुई
बंशी बंजारा ने बताया कि लॉकडाउन के बाद से ही राजस्थान में फंसे हमारे लोग यहां आने की कोशिश कर रहे हैं। दो-तीन बार वे 50-60 किमी पैदल चलकर आगे पहुंचे लेकिन इसी दौरान किसी न किसी जगह उन्हें रोक दिया गया। जब दोबारा से लॉक डाउन बढ़ा तो उन्होंने फिर कोशिश की लेकिन इस बार उन्हें चित्तौड़गढ़ से ही बाहर नहीं निकलने दिया गया। अभी दो दिन से तो हम मोबाइल से भी बात नहीं कर पा रहे हैं।

गांव के लोगों ने ही किया क्वारेंटाइन
आरोन से 7 किमी दूर रुसल्ला गांव के पूजारी को वहीं के लोगों ने 14 दिन के लिए क्वारेंटाइन कर दिया है। दरअसल 14 अप्रैल को इंदौर से आए 9 लोगों को पुजारी ने अपने घर पर खाना खिलाया था। बताया जाता है कि वे उनके रिश्तेदार थे। यह बात गांव में फैल गई। इसके बाद से पुजारी का गांव में प्रवेश निषिद्ध हो गया। उनका घर भी गांव के लगभग बाहर ही है। जिस मंदिर में वे पूजा करते हैं, वह पहले ही बंद है। हाल यह है कि जिस पुजारी को रोजाना 8-10 किलो आटे के अलावा दूध, घी का खूब चढ़ावा मिल जाता था, उन्हें अब गांव में ही घुसने से मना कर दिया गया है। यहां तक की पूजा के लिए मिलने वाले दूध की आपूर्ति भी बंद कर दी गई है।



Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today
190 people of Ismailpur prepare food to feed the stomach of some children left in the trapped village of Chittaurgarh


from Dainik Bhaskar https://ift.tt/3aju0Pw
via IFTTT

No comments:

Post a Comment