सोमवार को मनाई जाने वाली ईद-उल-फित्र इस बार 102 साल पुराने मंजर की याद दिलाएगी। उस वक्त लाइलाज स्पेनिश फ्लू की वजह से लोग एक-दूसरे के पास आने से डरने लगे थे और प्रार्थना-गृहों में भी खामोशी पसर गई थी। करीब एक सदी बाद कोरोना ने मसजिदों काे वीरान कर दिया है। इधर, प्रशासन ने पांच लोगों के साथ ईद की रस्मी नमाज की इजाजत देने से भी इंकार कर दिया है। वहीं महामारी के खात्मे के लिए समाजजन से दुआ की अपील की गई है। शहर काजी सैयद अहमद अली ने बुजुर्गों के हवाले से बताया कि करीब सौ साल पहले लाइलाज मर्ज फैला था। दरअसल, 1918 में फैले स्पेनिश फ्लू की वजह से तब प्रार्थनागृहों, मंदिरों, मसजिदों में लाेग दूरी बनाने लगे थे। वह फ्लू इतना खतरनाक था कि लक्षण जाहिर होने के बाद मरीज की 24 से 36 घंटे में मौत हो जाती थी। शहर काजी ने कहा कि प्रशासन की गाइडलाइन का ध्यान रखें और ईद पर घरों में ही रहें। गांधीजी भी चपेट में आ गए थे संकलनकर्ता हरिप्रसाद राय के मुताबिक जून 1918 की बात है। बंबई के समुद्री तट पर सैनिकों से भरे एक जहाज ने लंगर डाला। इसी के साथ एक वायरस ने भी डेरा जमा लिया। पोरबंदर में गांधीजी के आश्रम में भी यह वायरस पहुंच गया। करीब तीन महीने तक महात्मा गांधी भी बीमार हो गए थे। इस बीमारी ने उस वक्त भारत में 14 लाख और विश्व में 5 करोड़ लोगों की जान ली थी। 1914 से 1918 में पहले विश्व युद्ध के दरम्यान 4 सालों तक साफ-सफाई न होने और ठीक खाना न मिलने के कारण स्पेनिश फ्लू पनपा था। चांद दिखने के साथ ही दूध की दुकानों पर लगी भीड़ मगरिब की नमाज के बाद ईद का चांद नजर आया और इसी के साथ चांद मुबारक व ईद मुबारक का सिलसिला शुरू हो गया जो देर रात तक चलता रहा। चांद दिखने के बाद दूध की दुकानों पर भीड़ जुटी। सेंवई व शीरखुरमे की तैयारियों की वजह से लोग निकले। दूध डेयरियों पर इसकी खपत ज्यादा रही। ईद की नमाज के लिए मसजिद ही शर्त शहर काजी साहब ने बताया कि मसले के मुताबिक ईद की नमाज घरों में अदा नहीं की जा सकती। जिस तरह से जुमे की नमाज घर में अदा नहीं होती है। इसके लिए इज्न-ए-आम पहली शर्त है यानी सब खुलकर शामिल हो सकें। मसजिद में ही ईद-उल-फित्र की नमाज होती है। अलबत्ता चाश्त के वक्त चार रकाअत नफ्ल नमाज अदा कर सकते हैं। हालांकि इससे ईद की नमाज का ताल्लुक नहीं है। सेहरी व मगरिब बाद गूंजी अलविदा रमजान की सदाएं रमजान में जुमे पर अलविदा खुत्बा पढ़ा जाता है जो कोरोना वायरस की वजह से शुक्रवार को नहीं हो सका। इस कारण रविवार को सेहरी और मगरिब बाद अलविदा रमजान की सदाएं गूंजी जिसे सुनकर रोजेदारों की आंखें नम हो गईं। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Samajjan will perform four Rak'at Nafl prayers in homes, refusal to allow ritual prayers of five people


सोमवार को मनाई जाने वाली ईद-उल-फित्र इस बार 102 साल पुराने मंजर की याद दिलाएगी। उस वक्त लाइलाज स्पेनिश फ्लू की वजह से लोग एक-दूसरे के पास आने से डरने लगे थे और प्रार्थना-गृहों में भी खामोशी पसर गई थी। करीब एक सदी बाद कोरोना ने मसजिदों काे वीरान कर दिया है। इधर, प्रशासन ने पांच लोगों के साथ ईद की रस्मी नमाज की इजाजत देने से भी इंकार कर दिया है। वहीं महामारी के खात्मे के लिए समाजजन से दुआ की अपील की गई है।

शहर काजी सैयद अहमद अली ने बुजुर्गों के हवाले से बताया कि करीब सौ साल पहले लाइलाज मर्ज फैला था। दरअसल, 1918 में फैले स्पेनिश फ्लू की वजह से तब प्रार्थनागृहों, मंदिरों, मसजिदों में लाेग दूरी बनाने लगे थे। वह फ्लू इतना खतरनाक था कि लक्षण जाहिर होने के बाद मरीज की 24 से 36 घंटे में मौत हो जाती थी। शहर काजी ने कहा कि प्रशासन की गाइडलाइन का ध्यान रखें और ईद पर घरों में ही रहें।
गांधीजी भी चपेट में आ गए थे
संकलनकर्ता हरिप्रसाद राय के मुताबिक जून 1918 की बात है। बंबई के समुद्री तट पर सैनिकों से भरे एक जहाज ने लंगर डाला। इसी के साथ एक वायरस ने भी डेरा जमा लिया। पोरबंदर में गांधीजी के आश्रम में भी यह वायरस पहुंच गया। करीब तीन महीने तक महात्मा गांधी भी बीमार हो गए थे। इस बीमारी ने उस वक्त भारत में 14 लाख और विश्व में 5 करोड़ लोगों की जान ली थी। 1914 से 1918 में पहले विश्व युद्ध के दरम्यान 4 सालों तक साफ-सफाई न होने और ठीक खाना न मिलने के कारण स्पेनिश फ्लू पनपा था।

चांद दिखने के साथ ही दूध की दुकानों पर लगी भीड़
मगरिब की नमाज के बाद ईद का चांद नजर आया और इसी के साथ चांद मुबारक व ईद मुबारक का सिलसिला शुरू हो गया जो देर रात तक चलता रहा। चांद दिखने के बाद दूध की दुकानों पर भीड़ जुटी। सेंवई व शीरखुरमे की तैयारियों की वजह से लोग निकले। दूध डेयरियों पर इसकी खपत ज्यादा रही।

ईद की नमाज के लिए मसजिद ही शर्त
शहर काजी साहब ने बताया कि मसले के मुताबिक ईद की नमाज घरों में अदा नहीं की जा सकती। जिस तरह से जुमे की नमाज घर में अदा नहीं होती है। इसके लिए इज्न-ए-आम पहली शर्त है यानी सब खुलकर शामिल हो सकें। मसजिद में ही ईद-उल-फित्र की नमाज होती है। अलबत्ता चाश्त के वक्त चार रकाअत नफ्ल नमाज अदा कर सकते हैं। हालांकि इससे ईद की नमाज का ताल्लुक नहीं है।

सेहरी व मगरिब बाद गूंजी अलविदा रमजान की सदाएं
रमजान में जुमे पर अलविदा खुत्बा पढ़ा जाता है जो कोरोना वायरस की वजह से शुक्रवार को नहीं हो सका। इस कारण रविवार को सेहरी और मगरिब बाद अलविदा रमजान की सदाएं गूंजी जिसे सुनकर रोजेदारों की आंखें नम हो गईं।



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