काेराेना संक्रमण के बीच खेती के लिए सुकूनभरी खबर है। कृषि विज्ञान केंद्र में तीन महीने पहले सागर जिले से जाे अफ्रीकन केचुएं लाए गए थे। 55 दिनाें बाद उन्हाेंने अपना असर दिखा दिया है। 42 डिग्री तापमान पहुंचने के बाद भी इन केचुओं से 55 दिन में 100 क्विंटल खाद तैयार कर लिया गया है।
अच्छी बात यह है कि इस खाद काे खरीदने में किसानाें ने भी दिलचस्पी दिखाई है। अगले महीने मानसून आने के साथ ही खरीफ फसलाें की बाेवनी शुरू हाे जाएगी। ऐसे में किसानाें ने अभी से तैयारी करते हुए अफ्रीकन केचुओं से तैयार खाद खरीदना शुरू कर ली है। खाद तैयार हाेते ही 10 रु. किलाे के मान से 50 क्विंटल खाद बिक भी गई है। यानी शुरुआती दाैर में सीधे पांच हजार रुपए का फायदा विज्ञान केंद्र काे हुआ है। अभी किसानाें से और मांग आती जा रही है। इसे देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र में और 100 पीट बनाकर इन्हीं केचुओं से खाद तैयार की जाएगी।
वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डाॅ. केएस किराड ने बताया हर साल यूराेपियन केचुओं से खाद तैयार की जाती है, लेकिन तापमान 40 डिग्री पहुंचते ही केचुएं मरणासन स्थिति में पहुंच जाते हैं। इसीलिए फरवरी में सागर यूनिवर्सिटी से एक किलाे अफ्रीकन केचुएं खरीदकर इन्हें खाद में डाल दिया गया था। वर्तमान में तापमान 40 डिग्री पार जाने के बावजूद ये मरने की बजाए इनकी प्रजनन क्षमता बढ़ी है और माॅनसून आने से एक महीने पहले ही अच्छी मात्रा में खाद तैयार हाे गया। इससे किसानोंकाे खरीफ फसल के लिए ज्यादा मात्रा में रासायनिक खाद नहीं खरीदना हाेगा। ज्ञात रहें कि धार प्रदेश का दूसरा जिला है जहां अफ्रीकन केचुओं से बनी खाद तैयार हुई है। अभी सिर्फ सागर जिले में इन केचुओं से खाद तैयार की जाती है।
200 पिट में 20 हजार किलाे खाद तैयार करेंगे
किसानाें की मांग काे देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र में 200 पिट और तैयार की जाएगी। अभी एक पिट में 100 किलाे खाद तैयार हाेती है। भविष्य में 200 पीट में 20 हजार किलाे खाद तैयार की जाएगी। जिले में करीब 35 हजार किसान केचुएं से जैविक खाद तैयार करते हैं। किसान यूराेपियन केंचुए का उपयाेग करते है। ऐसे में गर्मी बढ़ने पर यह मर जाते है। ऐसे में कृषि विज्ञान केंद्र ने तय किया है कि कुछ केचुएं किसानाें में बांटे जाएंगे।
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