बुजुर्ग महिला ने मौत से पहले अवयस्क पोते व पोती के नाम अपनी जायदाद लिख जिन्हें गवाह बनाकर बच्चों को उनका हक दिलाने का जिम्मा सौंपा था, उन्हीं में से तीन गवाह वृद्धा की मौत के बाद पलट गए। ये तीन गवाह उसी संपत्ति पर दावा कर बच्चों के दुश्मन बन गए और उन्हें ताला लगाने से रोक दिया। मामला थाने पहुंचा तो पुलिस ने इस मसले को 5 घंटे में सुलझा बच्चों को उनका हक दिलवा दिया।
लॉकडाउन में भरोसे को तार-तार करने वाला ये किस्सा शुजालपुर में घटा। 3 मई को शुजालपुर के एमजी रोड निवासी कांताबाई सेन की बीमारी के चलते मौत हो गई थी। अंतिम संस्कार का खर्च भी रिश्तेदारों ने नहीं बल्कि अभिषेक सक्सेना, हेल्प फाॅर यू के सहयोगियों ने उठाया था। दादी को मुखाग्नि 14 साल की पोती नेहा ने दी थी। मृत वृद्धा कांताबाई ने इकलौते बेटे मनोज व पति नारायण की कुछ वर्ष पहले मौत के बाद अपनी बहू का दूसरा विवाह सहमति से अन्यत्र कराया था। तभी पोते यश उर्फ सूरज व पोती नेहा को उसके मामा के यहां भेज जून 2016 में कांता बाई ने परिवार व पंचायत के 11 लोगों को गवाह बनाकर अपनी मौत के बाद बेटे व स्वयं की जायदाद पोता-पोती को देने की वसीयत की थी।
मकान में ताले लगाने पर उतारू हो गए गवाह
मौत के बाद 15 मई को वृद्धा की तेरहवीं के कार्यक्रम के बाद पोता-पोती दोनों ने जब अपने पैतृक घर में ताला लगाना चाहा, तो वसीयत पर दस्तखत करने वाले 11 गवाहों में से तीन गवाह ही इस संपत्ति पर अपना हक जताने लगे। मकान में अपने-अपने ताले लगाने पर उतारू हो गए। मौके पर पुलिस पहुंची और सभी को थाने लाया गया। नन्हे बच्चों ने जब दादी द्वारा लिखी गई वसीयत के कागज पुलिस को दिखाए तो थाने में मौजूद अफसर हैरान रह गए।
मंडी थाने में 5 घंटे चली हक दिलाने की प्रक्रिया
करीब 5 घंटे तक मंडी थाने में बच्चों को हक दिलाने के लिए प्रधान आरक्षक गोपाल गिरवार, आरक्षक बाबूलाल पांचाल, एचसीएम जावरिया व अन्य पुलिसकर्मी भोजन करने तक नहीं गए।
पुलिस के सख्त बर्ताव से बदले गवाहों के सुर
मासूमों के साथ किए जा रहे गैरकानूनी बर्ताव पर पुलिसिया अंदाज में बात करते ही संपत्ति पर हक जमाने की कोशिश कर रहे तीनों गवाहों ने फिर अपना सुर बदल दिया। पुलिस ने दोपहर 1 बजे थाने पहुंचे बच्चों को शाम 6 बजे उनके मकान पर ताला लगवाकर वीडियोग्राफी कराकर बच्चों को चाबी सौंपी। कानूनन स्टाम्प पर सभी विवादित लोगों से बच्चों को संपत्ति देने पर कोई आपत्ति न होने की सहमति लिखवाने के बाद सबको जाने दिया। इस दौरान पुलिस ने रौब, नियम, कानून सबका उपयोग कर दो अनाथ बच्चों को उनका हक दिलाने के लिए सराहनीय भूमिका निभाकर खाकी के पीछ मानवीय चेहरे का उदाहरण पेश किया। पुलिस ने लिखा-पढ़ी में उन लोगों को भी गवाह बनाया जिन्होंने वृद्धा का अंतिम संस्कार करने में भूमिका निभाई थी। बच्चों की परवरिश का जिम्मा मामा मनोज को बच्चों के व्यस्क होने तक संपत्ति की देखरेख का जिम्मा भी दिया गया।
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