मृत्यु भोज शास्त्र सम्मत नहीं है। लेकिन देखा-देखी और लोग क्या कहेंगे, यह सोचने वाले इस कुप्रथा को जारी रखे हुए हैं। परिजन की मृत्यु का दु:ख मनाने की बजाए नुक्ते में अच्छी रसोई खिलाने की होड़ है। इसे हमें केवल इस नजरिए से नहीं देखना चाहिए कि इसे निभाने में गरीब कर्जे के बोझ से पिस जाता है। इसे रोकने की पहल इस सोच के साथ होना चाहिए कि इस राशि से समाज को एक स्थायी सुविधा दी जा सकती है। यह धर्माचार्य कह रहे हैं। वे मानते हैं मृत्युभोज कुप्रथा है, इसे रोका जा सकता है। इसके लिए समाजों को आगे आना होगा। हर व्यक्ति इतना साहसी नहीं होता कि स्वयं आगे आए लेकिन सामूहिक निर्णय होगा तो समान रूप से सभी स्तर के लोगों को मानना होगा। गरीब कर्जदार नहीं होगा और अमीर का धन समाज के काम आएगा। लॉकडाउन ने अमीर-गरीब का भेद मिटाया निरंजनी अखाड़े के महामंडलेश्वर स्वामी शांतिस्वरूपानंद गिरि कहते हैं लॉकडाउन में न गरीब के आगे कर्ज की मजबूरी खड़ी हुई न अमीर के सामने हैसियत दिखाने की। हम कथाओं में लोगों को इसी बात के लिए प्रेरित करते हैं कि हर स्तर पर इस कुप्रथा का निषेध हो। लेकिन गांव ही नहीं शहर में भी एक दूसरे की देखा-देखी और लोग क्या करेंगे, कुप्रथा चल ही रही है। हम शास्त्रों का पालन करें। कुप्रथाओं को रोक कर इस पर खर्च होने वाली राशि स्कूल, धर्मशाला, प्याऊ, आश्रम आदि में खर्च की जा सकती है। इसका स्थायी लाभ समाज को होगा। लोग हमेशा याद करेंगे कि यह उनकी पहल से बना है। यह दूसरों के लिए भी प्रेरणा बनेगा। मृत्यु भोज को समाज स्तर पर नकारना होगा रामानुज कोट के पीठाधीश्वर स्वामी रंगनाथाचार्य कहते हैं शास्त्रों ने कुप्रथाओं को जन्म नहीं दिया। समाज में ही पनपी है इसलिए समाज ही इसे समाप्त कर सकते हैं। शास्त्रों का पालन उतना ही किया जाना चाहिए जितना उनकी आज्ञा है। आज व्यवहारिक स्थिति यही है कि मृत्यु भोज जैसी कुप्रथाओं को समाज नकारे। अपने धन को समाज के विकास में खर्च करें। इन पर खर्च होने वाला धन समाजजनों की सुविधा या विकास पर खर्च होगा तो इसे लोग ज्यादा याद रखेंगे। जब भी उसका उपयोग करेंगे दिवंगत की स्मृति ताजा होगी। इस कड़ी में समाजों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें आगे बढ़ कर पहल करना होगी। कुप्रथा बंद की तो समाज की ऊर्जा का सदुपयोग महाकालेश्वर मंदिर स्थित महानिर्वाणी अखाड़े के महंत विनीत गिरि का मानना है कुप्रथाओं में समाज और व्यक्ति की ऊर्जा और धन का अपव्यय हो रहा है। भारतीय संस्कृति दिखावे में नहीं, समाज और राष्ट्र के उत्थान में विश्वास करती है। धर्मग्रंथों के आदेश का पालन बिना आडंबर के किया जा सकता है। इसके लिए समाज एकजुट होंगे तो वे ऊर्जा को विकास की दिशा में लगा सकेंगे। लॉकडाउन के कारण ही सही बदलाव की स्थिति तो बनी है, इसे अपनाएंगे को समाज मजबूत होगा। इस बदलाव को बिना किसी आलोचना के स्वीकारना चाहिए। कई समाज मृत्यु भोज को बंद कर चुके हैं। लेकिन जहां इस पर रोक नहीं लगी है वे अब सही समय पर यह कदम उठा सकते हैं। आप भी कर सकते हैं वॉट्सएप यदि समाज और संगठन इस कुप्रथा को पूरी तरह बंद करने के लिए सहमत हैं तो पदाधिकारी समाज की सहमति हमें वॉट्सएप पर भेज सकते हैं। हम आपकी सहमति को प्रकाशित करेंगे जिससे अन्य लोगों को भी प्रेरणा मिल सके। जो पदाधिकारी नहीं हैं वे भी अपनी राय दे सकते हैं। मृत्यु भोज में शामिल नहीं होने का निर्णय लेने वाले भी सिर्फ सहमत लिखकर आप हमें 9826111123 पर वॉट्सएप भेज सकते हैं। समाजों ने लिया संकल्प- मृत्युभोज बंद कराएंगे मेड़तवाल वैश्य समाज ने फैसला किया है कि समाज में मृत्युभोज बंद किया जाएगा। सचिव मनोहरलाल गुप्ता ने बताया समाज के सभी पदाधिकारी इससे सहमत हैं। इस प्रस्ताव को समाज की बैठक में रख कर कुप्रथा को खत्म किया जाएगा। समाज के सभी पदाधिकारियों ने मृत्युभोज त्यागने का प्रण भी ले लिया है। चिराड़ समाज के संचालक प्रेमनारायण आठिया व मूलचंद सोनी ने बताया समाज में पूर्व में मृत्यु भोज बंद करने के लिए प्रयास किए थे। लेकिन कुछ लोगों ने इस कुप्रथा को बढ़ावा दिया। अब श्री चिड़ार समाज सांस्कृतिक एवं कल्याण समिति संकल्प के साथ मृत्यु भोज को समाज से समाप्त करेगी। वैष्णव बैरागी समाज अध्यक्ष रामेश्वर बैरागी ने बताया समाज में मृत्युभोज की कुप्रथा को रोकने के लिए 2014 में भी प्रयास किए थे। इस पर पूरी तरह रोक नहीं लग पाई है। अब समाज में इस कुप्रथा को पूरी तरह समाप्त करने के लिए समाज स्तर पर फैसला लिया जाएगा। फैसले को लागू करने में सभी का सहयोग लेंगे। खटीक समाज के पूर्व अध्यक्ष गौरीशंकर कायत ने कहा राजस्थान सरकार ने मृत्युभोज पर रोक लगा दी है। इसी तरह की पहल मप्र में भी राज्य सरकार कर सकती है। लॉकडाउन में जब सरकार ने गाइड लाइन जारी तो सभी ने पालन किया। इसी तरह मृत्युभोज भी बंद किया जा सकता है। समाज स्तर पर भी इसे लागू किया जाएगा। और इनका भी संकल्प- छात्र मोहित प्रजापति ने कहा है कि मैं समाज में अपने स्तर पर मृत्युभोज बंद करने को लेकर प्रयास करता रहा हूं। आज मैंने प्रण लिया है कि मेरे स्वयं के परिवार में मृत्युभोज नहीं होगा। समाज में भी इसे लागू कराने का प्रयास जारी रखूंगा। इन्होंने दी सहमति- मनोहर कोटवानी, भारती रावल (श्रीगौड़ ब्राह्मण समाज), मोहन काला वीडी क्लॉथ मार्केट, निरंजन चौहान पाट, मोहित चौधरी। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today


मृत्यु भोज शास्त्र सम्मत नहीं है। लेकिन देखा-देखी और लोग क्या कहेंगे, यह सोचने वाले इस कुप्रथा को जारी रखे हुए हैं। परिजन की मृत्यु का दु:ख मनाने की बजाए नुक्ते में अच्छी रसोई खिलाने की होड़ है। इसे हमें केवल इस नजरिए से नहीं देखना चाहिए कि इसे निभाने में गरीब कर्जे के बोझ से पिस जाता है। इसे रोकने की पहल इस सोच के साथ होना चाहिए कि इस राशि से समाज को एक स्थायी सुविधा दी जा सकती है। यह धर्माचार्य कह रहे हैं। वे मानते हैं मृत्युभोज कुप्रथा है, इसे रोका जा सकता है। इसके लिए समाजों को आगे आना होगा। हर व्यक्ति इतना साहसी नहीं होता कि स्वयं आगे आए लेकिन सामूहिक निर्णय होगा तो समान रूप से सभी स्तर के लोगों को मानना होगा। गरीब कर्जदार नहीं होगा और अमीर का धन समाज के काम आएगा।

लॉकडाउन ने अमीर-गरीब का भेद मिटाया
निरंजनी अखाड़े के महामंडलेश्वर स्वामी शांतिस्वरूपानंद गिरि कहते हैं लॉकडाउन में न गरीब के आगे कर्ज की मजबूरी खड़ी हुई न अमीर के सामने हैसियत दिखाने की। हम कथाओं में लोगों को इसी बात के लिए प्रेरित करते हैं कि हर स्तर पर इस कुप्रथा का निषेध हो। लेकिन गांव ही नहीं शहर में भी एक दूसरे की देखा-देखी और लोग क्या करेंगे, कुप्रथा चल ही रही है। हम शास्त्रों का पालन करें। कुप्रथाओं को रोक कर इस पर खर्च होने वाली राशि स्कूल, धर्मशाला, प्याऊ, आश्रम आदि में खर्च की जा सकती है। इसका स्थायी लाभ समाज को होगा। लोग हमेशा याद करेंगे कि यह उनकी पहल से बना है। यह दूसरों के लिए भी प्रेरणा बनेगा।
मृत्यु भोज को समाज स्तर पर नकारना होगा
रामानुज कोट के पीठाधीश्वर स्वामी रंगनाथाचार्य कहते हैं शास्त्रों ने कुप्रथाओं को जन्म नहीं दिया। समाज में ही पनपी है इसलिए समाज ही इसे समाप्त कर सकते हैं। शास्त्रों का पालन उतना ही किया जाना चाहिए जितना उनकी आज्ञा है। आज व्यवहारिक स्थिति यही है कि मृत्यु भोज जैसी कुप्रथाओं को समाज नकारे। अपने धन को समाज के विकास में खर्च करें। इन पर खर्च होने वाला धन समाजजनों की सुविधा या विकास पर खर्च होगा तो इसे लोग ज्यादा याद रखेंगे। जब भी उसका उपयोग करेंगे दिवंगत की स्मृति ताजा होगी। इस कड़ी में समाजों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें आगे बढ़ कर पहल करना होगी।
कुप्रथा बंद की तो समाज की ऊर्जा का सदुपयोग
महाकालेश्वर मंदिर स्थित महानिर्वाणी अखाड़े के महंत विनीत गिरि का मानना है कुप्रथाओं में समाज और व्यक्ति की ऊर्जा और धन का अपव्यय हो रहा है। भारतीय संस्कृति दिखावे में नहीं, समाज और राष्ट्र के उत्थान में विश्वास करती है। धर्मग्रंथों के आदेश का पालन बिना आडंबर के किया जा सकता है। इसके लिए समाज एकजुट होंगे तो वे ऊर्जा को विकास की दिशा में लगा सकेंगे। लॉकडाउन के कारण ही सही बदलाव की स्थिति तो बनी है, इसे अपनाएंगे को समाज मजबूत होगा। इस बदलाव को बिना किसी आलोचना के स्वीकारना चाहिए। कई समाज मृत्यु भोज को बंद कर चुके हैं। लेकिन जहां इस पर रोक नहीं लगी है वे अब सही समय पर यह कदम उठा सकते हैं।

आप भी कर सकते हैं वॉट्सएप
यदि समाज और संगठन इस कुप्रथा को पूरी तरह बंद करने के लिए सहमत हैं तो पदाधिकारी समाज की सहमति हमें वॉट्सएप पर भेज सकते हैं। हम आपकी सहमति को प्रकाशित करेंगे जिससे अन्य लोगों को भी प्रेरणा मिल सके। जो पदाधिकारी नहीं हैं वे भी अपनी राय दे सकते हैं। मृत्यु भोज में शामिल नहीं होने का निर्णय लेने वाले भी सिर्फ सहमत लिखकर आप हमें 9826111123 पर वॉट्सएप भेज सकते हैं।

समाजों ने लिया संकल्प- मृत्युभोज बंद कराएंगे

मेड़तवाल वैश्य समाज ने फैसला किया है कि समाज में मृत्युभोज बंद किया जाएगा। सचिव मनोहरलाल गुप्ता ने बताया समाज के सभी पदाधिकारी इससे सहमत हैं। इस प्रस्ताव को समाज की बैठक में रख कर कुप्रथा को खत्म किया जाएगा। समाज के सभी पदाधिकारियों ने मृत्युभोज त्यागने का प्रण भी ले लिया है।
चिराड़ समाज के संचालक प्रेमनारायण आठिया व मूलचंद सोनी ने बताया समाज में पूर्व में मृत्यु भोज बंद करने के लिए प्रयास किए थे। लेकिन कुछ लोगों ने इस कुप्रथा को बढ़ावा दिया। अब श्री चिड़ार समाज सांस्कृतिक एवं कल्याण समिति संकल्प के साथ मृत्यु भोज को समाज से समाप्त करेगी।
वैष्णव बैरागी समाज अध्यक्ष रामेश्वर बैरागी ने बताया समाज में मृत्युभोज की कुप्रथा को रोकने के लिए 2014 में भी प्रयास किए थे। इस पर पूरी तरह रोक नहीं लग पाई है। अब समाज में इस कुप्रथा को पूरी तरह समाप्त करने के लिए समाज स्तर पर फैसला लिया जाएगा। फैसले को लागू करने में सभी का सहयोग लेंगे।
खटीक समाज के पूर्व अध्यक्ष गौरीशंकर कायत ने कहा राजस्थान सरकार ने मृत्युभोज पर रोक लगा दी है। इसी तरह की पहल मप्र में भी राज्य सरकार कर सकती है। लॉकडाउन में जब सरकार ने गाइड लाइन जारी तो सभी ने पालन किया। इसी तरह मृत्युभोज भी बंद किया जा सकता है। समाज स्तर पर भी इसे लागू किया जाएगा।
और इनका भी संकल्प- छात्र मोहित प्रजापति ने कहा है कि मैं समाज में अपने स्तर पर मृत्युभोज बंद करने को लेकर प्रयास करता रहा हूं। आज मैंने प्रण लिया है कि मेरे स्वयं के परिवार में मृत्युभोज नहीं होगा। समाज में भी इसे लागू कराने का प्रयास जारी रखूंगा।
इन्होंने दी सहमति- मनोहर कोटवानी, भारती रावल (श्रीगौड़ ब्राह्मण समाज), मोहन काला वीडी क्लॉथ मार्केट, निरंजन चौहान पाट, मोहित चौधरी।



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