विपत्ति को भी उत्सव कैसे बनाया जाता है, यह देखना है तो रेसकोर्स रोड आइए! जी हां, लॉकडाउन के 30 दिनों में यहां पूरा मोहल्ला ही परिवार बन गया है। यहां के हर सुख-दु:ख में सभी लोग एकसाथ हैं। यहां एक परिवार में जब बेटी का जन्म हुआ और उसे हॉस्पिटल से घर लाए तो गली के सभी लोगों ने सड़क के दोनों ओर खड़े होकर तालियों एवं रूमाल फहराकर बच्ची और उसकी मां का वेलकम किया। हर रविवार यहां व्हाट्सएप ग्रुप पर तंबोला का भी आयोजन होता है। सामूहिक लॉकडाउन 850 परिवार के 4500 लोगों को कोरोना से बचाने में ऐतिहासिक भूमिका निभा रहा है।
क्षेत्र में बुजुर्ग दंपतियों का सभी ने माता-पिता की तरह ध्यान रखा
लॉकडाउन के जो नियम बनाए थे, उसका सभी परिवारों ने पूर्णतः पालन किया है। सबसे विशेष बात यह रही कि मोहल्ले के डॉक्टरों की जो टीम बनाई थी, उनका भी सराहनीय योगदान रहा। जो लोग नियम पालन में कमजोरी कर रहे थे उन्होंने भी दूसरों को देख अपने आप को नियमों में ढाल लिया। इस लॉकडाउन में कई बुजुर्ग दंपतियों का आसपास के परिवारों ने ऐसा ध्यान रखा मानो वह उनके ही माता-पिता हैं। सभी नियमों का कोरोना से बचने के लिए पालन करते हुए कई कठिनाइयाें और विपत्तियों को मोहल्ले की सामूहिकता ने आनंद व उत्साह में बदल दिय। लॉकडाउन ने पूरे मोहल्ले में एक पारिवारिक माहौल बना दिया। किसी को किसी सामान की जरूरत पड़ती थी तो कई लोग उसकी जरूरत पूरी करते थे। रेसकोर्स रोड लॉकडाउन के मुख्य समन्वयक डॉ. अनिल भंडारी ने बताया मॉर्निंग वॉक में लोगों की चर्चा, सामूहिक योगासन, महिलाओं का आपसी मेलजोल व युवाओं की अलग-अलग विषयों पर चर्चा इन सभी ने लॉकडाउन की विपत्ति का अहसास ही नहीं होने दिया।
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