जिले के वन ग्रामों में रहने वाले आदिवासी कोरोना संक्रमण काल में भी अपने क्षेत्रों में पारंपरिक भोजन और दिनचर्या के साथ सुरक्षित हैं। इथनाेमेडिसिन के शोध में लगे वैज्ञानिक केसला ब्लॉक के वन क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों की स्ट्राॅग इम्युनिटी के राज पता कर रहे हैं। कोरोना जैसी महामारी के समय जब डाॅ. रवि अभ्यंकर और उनकी टीम ने आदिवासी ग्रामीणों के घर का सर्वे किया तो पाया कि अपने दैनिक उपयोग में बाजार में मिलने वाले फिल्टर्ड और रिफाइंड घी और तेल की जगह आदिवासी परिवार बीनकर लाई महुआ गुल्ली के बीज का तेल खाने में उपयोग करते हैं। महुआ की गुल्ली के तेल की हल्की कड़वाहट भरा स्वाद इन आदिवासी परिवारों को कई बीमारियाें से बचाता है और इनकी इम्युनिटी पावर भी बढ़ाता है।
आदिवासी इस तरह बनाते हैं महुआ गुल्ली का तेल
जिले के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र केसला ब्लाक के 109 गांव में बसे करीब 90 हजार गोंड, कोरकु आदिवासी अपनी आजीविका के लिए वनोपज पर आश्रित हैं। रतिबंदर के रामदीन, सोमूखेड़ा के हीरालाल बताते हैं प्रकृति, वन और महुआ के पेड़ की पूजा करने वाले आदिवासी परिवारों में अधिकांश लोग महुआ बीनने का काम करते हैं। कास्दाखुर्द के कमल बताते हैं मई-जून में महुआ गुल्ली को कड़ी धूप में सुखाकर अपने घरों में रखते हैं। जुलाई माह की शुरुआत में घर में ही लगी चक्की में बीज को पीसकर तेल निकाला जाता है। हर परिवार एक साल में अपने दैनिक उपयोग के लिए करीब 60 से 70 लीटर तेल एक साथ स्टाॅक करके रखता है। सिलवानी के प्रेमलाल ने बताया कि तेल जितना पुराना होता है उतना ही गुणकारी होता है। तेल निकालने के बाद बीज की खली भी खेत में खाद की तरह उपयोग की जाती है।
इम्युनिटी पावर बढ़ाता है महुआ गुल्ली का तेल
महुआ का तेल ऊष्ण प्रकृति का होता है। कफ, शीत नहीं बढ़ने देता और इम्युनिटी पावर बढ़ाता है। 100 ग्राम तेल में 11.7 से 25.9 प्रतिशत पामिटिक अम्ल, 19.1 से 32.2 प्रतिशत स्टीयरिक अम्ल, आइलेक अम्ल 32.8 से 48.6 प्रतिशत और लिनोइक अम्ल 9.4 से 15.4 प्रतिशत होता है।
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